प्रेरणा स्रोत
महर्षि दयानन्द सरस्वती — जिनके आलोक में यह गुरुकुल प्रकाशित है
हमारे गुरुकुल की प्रेरणा का मूल स्रोत हैं युगद्रष्टा महर्षि दयानन्द सरस्वती — जिन्होंने भारत को "वेदों की ओर लौटो" का अमर संदेश दिया और नारी शिक्षा को राष्ट्र-उत्थान का आधार बताया।
जीवन-यात्रा
- १८२४
जन्म
सन् १८२४, टंकारा (गुजरात)। बचपन का नाम मूलशंकर।
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गुरु-दीक्षा
मथुरा में प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द जी से वेद-विद्या का अध्ययन। गुरु-आज्ञा मिली — "संसार में जाकर अज्ञान का अंधकार मिटाओ।"
- १८७५
आर्य समाज की स्थापना
सन् १८७५, मुम्बई। सत्य, ज्ञान और सेवा के सिद्धांतों पर आधारित।
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महाग्रन्थ
सत्यार्थ प्रकाश की रचना। सत्य और असत्य का विवेक कराने वाला प्रकाश-स्तम्भ।
- १८८३
महाप्रयाण
सन् १८८३। पर उनकी चेतना "कृण्वन्तो विश्वमार्यम्" के रूप में आज भी अमर है।
नारी शिक्षा के पुरोधा
महर्षि दयानन्द उस युग में नारी शिक्षा के प्रबल समर्थक रहे, जब यह कल्पना भी कठिन थी। उन्होंने कहा — जिस समाज में नारी शिक्षित और सम्मानित होती है, वही समाज सच्चे अर्थों में उन्नत होता है। उन्हीं की प्रेरणा से देशभर में कन्या गुरुकुलों की परम्परा जन्मी — और यही परम्परा आज पानीपत में पुष्पित हो रही है।
विचार-सूत्र
वेद समस्त सत्य विद्याओं का मूल हैं।
मनुष्य का जन्म कर्म करने के लिए हुआ है, भोग के लिए नहीं।
जिसका आचरण श्रेष्ठ है, वही सच्चा आर्य है।
सबसे बड़ा धर्म है — परोपकार।
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्
ऋग्वेद ९/६३/५
सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठ (आर्य) बनाओ — यही महर्षि का स्वप्न, यही हमारा ध्येय।